अ – क्या तुम्हें मुझसे प्यार है ?
आ – शायद है, शायद नहीं है – क्या पता ?
अ – तुम्हें पता नहीं, तुम्हें मुझसे प्यार है या नहीं ?
आ – कितना कुछ है, क्या मुझे हर बात का पता है ?
अ – लेकिन क्या यह अंदर की बात नहीं है ?
आ – मुझे कैसे पता चलेगा मेरे अंदर क्या है ?
अ – अगर तुम्हें पता नहीं, तो मुझे कैसे पता चलेगा ?
आ – तुम्हें पता चलने से क्या फ़र्क पड़ जाएगा ?
अ – क्यों नहीं, क्या मुझे तुमसे प्यार नहीं है ?
आ – है तो है, क्या उसके लिए मुझे तुमसे प्यार होना ज़रूरी है ?
- उज्ज्वल भट्टाचार्य