Sonntag, 29. Mai 2011

बर्लिन ज़ू का बाघ

सींखचों के उस पार से
देखते हैं मुझे
बच्चे, बूढ़े, औरतें.
उनके चेहरों पर
कभी मासूमियत झलकती है,
कभी हैरत,
और कभी-कभी यह डर भी :
अगर बीच में ये सींखचे न होते...

कभी-कभी वे
मेरी तारीफ़ के पुल बाँध देते हैं,
और हमारे बीच के फ़ासले में
डूब जाता है वो लंबा किस्सा
जो किसी बीहड़ जंगल से शुरू होकर
शहर के बीचोबीच
मुझे इस पिंजरे तक ले आता है.

यहां मुझे आराम से रखा गया है.
ठहरने-खाने-पीने का बंदोबस्त है.
दिल बहलाने के लिए
दिन भर लोग-बाग़ आते रहते हैं.
मुझे देखकर मुंह बनाते हैं,
जीभ निकालते हैं.
कभी-कभी
मैं भी उनके बीच होना चाहता हूं,
काश
अगर बीच में ये सींखचे न होते.

हर रोज़ मिलता है गोश्त.
ताज़ा नहीं,
लेकिन भरपेट.
यानी कि लोगों को देखते हुए
मुझे भूख तो नहीं सताती,
लेकिन झपटने का मन ज़रूर करता है.
मुझे औरतें पसंद हैं
ख़ास तौर पर.
कहीं ज़्यादा मांस होता है
उनके सीने, जांघों और नितंबों पर -
मेरे पुट्ठे तन जाते हैं,
एक लहर दौड़ जाती है खाल के उपर,
कहीं किसी के गले से
हल्की सीत्कार सी निकल आती है

मेरे पिंजरे के बाहर
एक तख़्ती पर करीने से लिखी गई है
मेरी जन्मपत्री -
कहां से मैं आया,
क्या है मेरी ख़ूबी,
कैसा है खानदान.
कभी-कभी
साथ में अपनी जमात लेकर
चश्मा पहने अधेड़ सा कोई शख्स आता है
और बताता है उन्हें
मेरे बारे में,
कि उस बीहड़ जंगल में,
जहां से मुझे लाया गया,
अब बाघ ख़त्म होते जा रहे हैं.
जबकि यहां
बर्लिन के बीचोबीच
गोरे साहबों की बदौलत
बाघों की तादाद बढ़ रही है.
इस बाघ से भी कई बच्चे हो चुके हैं.

बात सही है.
कभी-कभी
कोई बाघिन भेज दी जाती है
मेरे पिंजरे में.
वह ऊबती रहती है
और मैं भी.
लेकिन हमें पता होता है,
जब तक बाघिन गाभिन नहीं हो जाती,
एक-दूसरे से छुटकारा मिलने को नहीं.
चुनांचे...

दिन यूं ही गुज़रते हैं.
बीहड़ जंगल अब सपने में भी नहीं आता.
मैं ख़ुश तो नहीं,
मायूस भी नहीं हूं.
भले ही हर दिन एक जैसा होता है,
उन्हें अलग तरीके से देखने की कोशिश
बनी हुई है.
वैसे कभी-कभी
अपने आपसे सवाल करता हूं :
पिंजरे के बाहर से
अंदर झांकना कैसा होगा?
काश
अगर बीच में ये सींखचे न होते.

- उज्ज्वल भट्टाचार्य

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