सैमुएल बेकेट के पात्रों की तरह प्रबुद्ध भारत समय समय पर एकजुट होता है, उसे इंतज़ार रहता है बहुप्रतीक्षित गोदो का. गोदो क्या है, कौन है – पता नहीं, लेकिन वह चिरप्रतीक्षित है, उसका जन्म हमारी आकांक्षाओं से हुआ है. यदा यदा धर्मस्य ग्लानि होगी, वह आएगा. कुछ लोग कह रहे हैं कि वह आ चुका है, कुछ लोग इतने आश्वस्त नहीं हैं, लेकिन मान रहे हैं कि अब वह आने ही वाला है.
जी हां, अण्णा के अभियान के प्रसंग में यह बातें कह रहा हूं, और इस अभियान का मज़ाक उड़ाने का कोई मकसद मेरा नहीं है. बेशक इस अभियान का चरित्र जन आंदोलन का चरित्र रहा है – और सबसे बड़ी बात कि इसमें शरीक होने वाले एक बड़े हिस्से की चेतना में अण्णा के सादे निर्मल चरित्र के प्रति भक्ति से कहीं ज़्यादा अपनी और जनता की उठ खड़े होने की ताकत पर अवाक होने, यहां तक कि उल्लसित हो उठने का भाव छिपा है. यह स्थिति नहीं, प्रक्रिया का जयगान है. इसका स्वागत किया जाना चाहिए.
अपनी नई पुस्तक, इन डिफ़ेंस ऑफ़ लॉस्ट कॉज़ेज़ में स्लावोय चिचेक आज के दौर की एक खतरनाक साज़िश की ओर ध्यान दिलाते हैं कि एक व्यापक और विशाल सहमति के ज़रिये सारे मुक्तिकामी विचारों और सामाजिक-राजनैतिक परियोजनाओं को हाशिये पर धकेल दिया जाए. इस साज़िश के तहत कहा जा रहा है कि महान विचारों का युग अब ख़त्म हो चुका है, जोड़-तोड़ और मरम्मत के ज़रिये यथास्थिति को बनाए रखना है.
और इस साज़िश के खिलाफ़ एक छटपटाहट है. समय-समय पर मुद्दों को समझने, उन्हें सार्वजनिक मंच पर प्रतिष्ठित करने, उनके आधार पर सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन का बीज तैयार करने की एक कशिश है. यह आसान नहीं है. पिछली कई सदियों से राजनीतिक दल या सामाजिक आंदोलन इस भूमिका को निभाते रहे हैं. आज वे यथास्थिति की संरचना के अंग बन चुके हैं. विकल्प के रूप में नागरिक समाज सामने आ तो रहा है, लेकिन वह अपने आभिजात्य के दायरे में सिमटा हुआ है, पसीने की बू उसे नहीं भाती.
इसमें कोई अचरज नहीं कि अवतारों की पुण्यभूमि में साकार देवताओं की तड़प रहेगी, वे यदा-कदा दिखते रहेंगे. कभी वे महात्मा के रूप में आते हैं, कभी लोकनायक के रूप में, कभी लगभग निराकार मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रतीक बनकर, तो कभी गांधी नंबर दो की शक्ल में. इनकी नैतिकता के रूप अलग-अलग हो सकते हैं, स्तर भी, लेकिन इनके पीछे जो ललक छिपी रहती है, वह लगभग एक समान है. एक आदर्श भारत, एक आदर्श समाज है – जिसे कुंठाओं और विसंगतियों से मुक्त करना है. एक आदर्श पुरुष आएगा, जो हम सबके अंदर छिपे आदर्श का प्रतीक होगा, प्रतिनिधि होगा.
और इस आंदोलन में एक नारे के रूप में यह ललक सामने आई है – मैं अण्णा हूं. यानी अण्णा को देखकर मुझे पता चला है, मैं कौन हूं.
यक्ष के प्रश्न के उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा था : महाजनो येन गतः स पन्था. महाभारत के बंगला अनुवाद में राजशेखर वसु ने महाजन शब्द की व्याख्या बहुजन या सर्वजन के रूप में की थी. यहां जिन आंदोलनों का उल्लेख किया गया है, उन सभी में मुद्दे को सर्वजन या बहुजन के मुद्दे के रूप में प्रतिष्ठित करने की कोशिश की गई है. सूचना का अधिकार सबके लिए है, संसाधनों का संगत उपयोग सबके लिए है, यहां तक कि सामाजिक कल्याण भी सबके हित में है. और भ्रष्टाचार सबकी समस्या है.
और इन सबके पीछे एक भारत है, जो बहुजनहिताय बहुजनहिताय है, जो स्वर्गादपि गरीयसी है.
क्या ऐसा है ? क्या हमारे भारत में आजका छत्तीसगढ़ या झारखंड, सन 2002 का गुजरात नहीं है ? हमारे घर में रोज़ बर्तन मांजने वाली नहीं है ? क्या हमारे सपने एक जैसे हैं ? क्या हमारे बच्चे साथ-साथ खेलते हैं ? क्या उन्हें बचपन में एक जैसी कहानियां सुनाई जाती हैं ? हमारी परंपरा में सिर्फ मर्यादा पुरुषोत्तम ही नहीं हैं, यह कथन भी है, कोई नृप होई, हमें क्या हानि. क्या यह कथन सर्वजन का है, क्या यह बहुजन का कथन नहीं है ?
क्या भारत सिर्फ एक है, अनेक नहीं ? अण्णा के आंदोलन के बाद इन दोनों के बीच फ़र्क मिट रहा है ? या वे दोनों उभरकर सामने आ रहे हैं ?
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