मध्यवर्ग
ख़तरे की भनक मिलते ही
मैं रेंगने लगता हूं
पीछे की ओर -
सरकती जाती है
मेरी चूतड़
धीरे-धीरे,
जगह बनाती है
सुराख के अंदर.
अब मैं आश्वस्त हूं -
सिर घुमाकर देखता हूं
खुले आसमान से
आते, न-आते ख़तरों को.
चीख चिल्लाकर
मैं अपनी भड़ास निकाल सकता हूं.
ज़रूरत पड़ने पर
मेरी चूतड़
मुझे खींच ले जाएगी
सुराख के अंदर
- उज्ज्वल भट्टाचार्य
ख़तरे की भनक मिलते ही
मैं रेंगने लगता हूं
पीछे की ओर -
सरकती जाती है
मेरी चूतड़
धीरे-धीरे,
जगह बनाती है
सुराख के अंदर.
अब मैं आश्वस्त हूं -
सिर घुमाकर देखता हूं
खुले आसमान से
आते, न-आते ख़तरों को.
चीख चिल्लाकर
मैं अपनी भड़ास निकाल सकता हूं.
ज़रूरत पड़ने पर
मेरी चूतड़
मुझे खींच ले जाएगी
सुराख के अंदर
- उज्ज्वल भट्टाचार्य
Keine Kommentare:
Kommentar veröffentlichen