Sonntag, 11. September 2011

मिडल क्लास ब्लूज़

रेल के डिब्बे में
ज़िंदगी का अहसास होता है
लोग मिलते हैं बतियाते हैं
कुछ देर की ख़ातिर
कुछ भोले होते हैं कुछ शायद शातिर
मेरा क्या आता-जाता है
उनसे मेरा कौन सा नाता है
आराम से बैठा हूं यहां
डिब्बा चारों ओर से बंद है
बाहर मौसम कैसा भी हो
अंदर एअरकंडीशंड है
सामने बैठे शख़्स की तरह
मैं खा-पीकर पुष्ट हूं
ख़ुश नहीं संतुष्ट हूं
मुझे तंग मत करो
मुझे तंग मत करो

डिब्बे के अंदर
हिलने-डुलने की गुंजाइश कम है
ज़रूरत कतई नहीं
मैं जहां हूं वहीं ठहरा हूं
कुछ घंटों में पहुंच जाउंगा और कहीं
रेल की व्यवस्था में सुरक्षित
मैं आगे बढ़ता जाता हूं
खिड़की के बाहर
पिछड़ती जा रही है सारी दुनिया
सामने कहीं कोई मंज़िल है
जहां पहुंचने की ज़िम्मेदारी
रेलगाड़ी की है
मेरी नहीं
मैं खा-पीकर पुष्ट हूं
ख़ुश नहीं संतुष्ट हूं
मुझे तंग मत करो
मुझे तंग मत करो

तेज़ चलती रेलगाड़ी के लिए
बाकी मुल्क कुछ स्टेशनों के नाम हैं
जहां कुछ मिनटों का रुकना है
बाहर की दुनिया सिर्फ़ एक प्लैटफ़ार्म है
जिससे हमारा नाता
मिनरल वाटर की बोतल खाली होने पर बनता है
या अगर मिल जाए
थोड़ा लेफ़्ट सा कोई रिसाला
- क्या खूब लिखती है
इस लड़की की कलम में तो वाकई जादू है
थोड़ी नादान है
तैंतीस फ़ीसदी से काम बन जाएगा
अगर आठ फ़ीसदी का दस हो जाए
रेलगाड़ी चल पड़ी है
बाहर की दुनिया
फिर से दौड़ने लगी है पीछे की ओर
कितने वाकए पीछे छूट चुके हैं
कितने अभी सामने हैं
रेलगाड़ी दौड़ रही है उनकी ओर
हमेशा की तरह
किसने उसे रोका है
खिड़की के चौखटे की दरमियानी तस्वीर
महात्मा गांधी और राहुल गांधी के बीच
पीएम के चेहरे की तरह
मन मोहने का धोखा है
उनकी फीकी मुस्कान से आश्वस्त हूं
सोचता हूं स्वस्थ हूं
मुझे तंग मत करो
मुझे तंग मत करो

- उज्ज्वल भट्टाचार्य

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