Sonntag, 11. September 2011

दलदल - बर्तोल्त ब्रेष्त

कुछ दोस्तों को देखा मैंने,
और उनमें से सबसे प्यारों को
लाचार धंसा हुआ दलदल में,
जिसके बगल हो हर रोज मैं गुजरता हूं


और यूं नहीं कि हुआ हो ऐसा
अचानक किसी सुबह
अक्सर
कई-कई हफ्ते लग गए इसमेः
यह और खौफनाक था।

और फिर यादें हमारी
लंबी बातचीत की उस दलदल पर, जिसमें
कितने ही अब तक डूब चुके


लाचार मैंने देखा अब उन्हें पड़ा हुआ
खून चूसती जोकों से ढका हुआ
चमकती हुई
आहिस्ता से सरकती कीचड़ में धंसते हुए
चेहरे पर कुत्सित
कामना भरी मुस्कान.

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