Sonntag, 11. September 2011

द्वंद्वात्मकता की प्रशस्ति - बर्तोल्त ब्रेष्त

बढ़ती जाती है नाइंसाफी
सधे कदमों के साथ
जालिमों की तैयारी है
दस हजार साल की
हिंसा ढाढंस देती है
जैसा है, रहेगा वैसा ही
सिवाय हुक्मरानों के
किसी की आवाज नहीं
और बाजार में लूट की चीख
शुरुआत तो अब होनी है
पर लूट के शिकारों में से बाज़ कहने लगे हैः
जो हम चाहते हैं, वो कभी होना नहीं
गर जिंदा हो अब तलक, कहो मतः कभी नहीं
निश्चित कतई निश्चित नहीं है
जैसा है, वैसा नहीं रहेगा
जब हुक्मरान बोल चुके होंगे
बारी आएगी हुक्म निभाने वालों की
किसकी हिम्मत है कहने कीः कभी नहीं?
जिम्मेदार कौन है, अगर लूट जारी है?
हम खुद
किसकी जिम्मेदारी है कि वह खत्म हो ?
खुद हमारी जिसे कुचला गया,
उसे उठ खड़े होना है
जो हारा, उसे लड़ते रहना है
अपनी हालत जिसने पहचानी
रोकेगा कौन उसे?
फिर आज जो पस्त हैं कल होगी उनकी जीत
और कभी नहीं के बजाय गूंजेगाः आज अभी !

मूल जर्मन भाषा से अनुवाद - उज्ज्वल भट्टाचार्य

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