Samstag, 1. Oktober 2011

प्रेम संवाद – 3

अ – क्या तुम्हें मुझसे प्यार है ?

आ – शायद है, शायद नहीं है – क्या पता ?

अ – तुम्हें पता नहीं, तुम्हें मुझसे प्यार है या नहीं ?

आ – कितना कुछ है, क्या मुझे हर बात का पता है ?

अ – लेकिन क्या यह अंदर की बात नहीं है ?

आ – मुझे कैसे पता चलेगा मेरे अंदर क्या है ?

अ – अगर तुम्हें पता नहीं, तो मुझे कैसे पता चलेगा ?

आ – तुम्हें पता चलने से क्या फ़र्क पड़ जाएगा ?

अ – क्यों नहीं, क्या मुझे तुमसे प्यार नहीं है ?

आ – है तो है, क्या उसके लिए मुझे तुमसे प्यार होना ज़रूरी है ?


- उज्ज्वल भट्टाचार्य

Donnerstag, 29. September 2011

प्रेम संवाद - 2

अ – दरअसल, प्यार एक अहसास है.

आ – यानी ?

अ – मैं कुछ महसूस करता हूं...तुम्हारे सिलसिले में.

आ – तुम महसूस करते हो. यानी तुम्हारा अहसास है.

अ – बिल्कुल ठीक.

आ – मुझे भूख लगी है.

अ – फिर कुछ खा लिया जाए.

आ – तुम्हें भी भूख लगी है ?

अ – कोई खास नहीं. पर खा लूंगा.

आ – क्योंकि मुझे भूख लगी है ?

अ – हां, वैसे थोड़ी सी भूख मुझे भी है शायद.

आ – तुम्हें पता चला, क्योंकि मुझे भूख लगी है ?

अ – हां, नहीं तो तुम्हें अकेले खाना पड़ेगा.

आ – तुम खाओगे, क्योंकि मुझे भूख लगी है ?

अ – हां, लेकिन ऐसी बात भी नहीं है कि मुझे बिल्कुल भूख नहीं लगी है.

आ – लेकिन तुम्हें भूख नहीं लगी थी.

अ – लेकिन अब लगता है कि थोड़ी सी भूख है.

आ – क्योंकि तुम्हें पता चला कि मुझे भूख लगी है.

अ – हां, बात कुछ ऐसी ही है.

आ – अब मुझे भूख नहीं लग रही है.

अ – क्यों ?

आ – क्योंकि मुझे पता चला कि तुम्हें भूख नहीं लगी थी.


- उज्ज्वल भट्टाचार्य

Mittwoch, 28. September 2011

Liebesgespräch

A - Ich liebe Dich !
B - Wie tust Du es ?
A - Was meinst Du ?
B - Was tust Du, wenn Du mich liebst ?
A - Was ich tue ? Gar nichts...
B - Du tust etwas, ohne etwas zu tun ?
A - Eigentlich... tue ich vielleicht etwas, nur... ich weiss nicht was ich tue.
B - Dann sind wir in der selben Lage.
A - Und wie ?
B - Du tust was, ohne zu wissen Wie und Was.
A - Vielleicht...
B - Und mir tust Du es, aber ich merke es nicht.
- Ujjwal Bhattacharya

प्रेम संवाद - 1

अ - मैं तुमसे प्यार करता हूं.

आ - कैसे ?

अ - मतलब ?

आ - क्या करते हो, जब प्यार करते हो ?

अ - क्या करता हूं ? कुछ नहीं !

आ - कुछ किए बिना कुछ - यानी प्यार - कर लेते हो ?

अ - दरअसल... शायद कुछ करता हूं. लेकिन कह नहीं सकता, क्योंकि मुझे पता नहीं कि क्या करता हूं.

आ - इस मामले में हम दोनों की हालत एक सी है.

अ - वह कैसे ?

आ - तुम कुछ करते हो, पर तुम्हें पता नहीं क्या और कैसे.

अ - शायद...

आ - और तुम मेरे साथ, या मुझसे कुछ करते हो, और मुझे भी पता नहीं चलता.


- उज्ज्वल भट्टाचार्य

Mittwoch, 21. September 2011

मेरा वक्त मेरा दिल

मेरे सीने के अंदर
घड़ी की एक सुई
अपनी कहानी सुनाती रहती है
टिक-टिक, टिक-टिक
और फिर
एक छोटा सा दरवाज़ा खुलता है
एक पंछी सा तुम्हारा चेहरा उभरता है
कहता है
कुक-कुक, कुक-कुक
एक हल्की सी मुस्कान
फैल जाती है
मेरे होठों पर
और उसके बाद
सुनता रहता हूँ
टिक-टिक, टिक-टिक
अपने दिल की कहानी

- उज्ज्वल भट्टाचार्य

Sonntag, 11. September 2011

तीन सवाल एक साथ / एरिष फ़्रीड

क्या एक कविता
एक ऎसी दुनिया में
-- जो अपने में ही टूट-फूटकर
शायद पतन के गर्त में जा रही हो--
अब भी सरल रह सकती है?

क्या एक कविता
एक ऎसी दुनिया में
-- जो शायद पतन के गर्त में जा रही हो
अपने में ही टूट-फूटकर--
सरल के सिवा कुछ और हो सकती है?

क्या एक दुनिया
-- जो शायद अपने में ही
टूट-फूटकर पतन के गर्त में जा रही हो--
कविता पर हुक्म चला सकती है?

मूल जर्मन भाषा से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य

द्वंद्वात्मकता की प्रशस्ति - बर्तोल्त ब्रेष्त

बढ़ती जाती है नाइंसाफी
सधे कदमों के साथ
जालिमों की तैयारी है
दस हजार साल की
हिंसा ढाढंस देती है
जैसा है, रहेगा वैसा ही
सिवाय हुक्मरानों के
किसी की आवाज नहीं
और बाजार में लूट की चीख
शुरुआत तो अब होनी है
पर लूट के शिकारों में से बाज़ कहने लगे हैः
जो हम चाहते हैं, वो कभी होना नहीं
गर जिंदा हो अब तलक, कहो मतः कभी नहीं
निश्चित कतई निश्चित नहीं है
जैसा है, वैसा नहीं रहेगा
जब हुक्मरान बोल चुके होंगे
बारी आएगी हुक्म निभाने वालों की
किसकी हिम्मत है कहने कीः कभी नहीं?
जिम्मेदार कौन है, अगर लूट जारी है?
हम खुद
किसकी जिम्मेदारी है कि वह खत्म हो ?
खुद हमारी जिसे कुचला गया,
उसे उठ खड़े होना है
जो हारा, उसे लड़ते रहना है
अपनी हालत जिसने पहचानी
रोकेगा कौन उसे?
फिर आज जो पस्त हैं कल होगी उनकी जीत
और कभी नहीं के बजाय गूंजेगाः आज अभी !

मूल जर्मन भाषा से अनुवाद - उज्ज्वल भट्टाचार्य

दलदल - बर्तोल्त ब्रेष्त

कुछ दोस्तों को देखा मैंने,
और उनमें से सबसे प्यारों को
लाचार धंसा हुआ दलदल में,
जिसके बगल हो हर रोज मैं गुजरता हूं


और यूं नहीं कि हुआ हो ऐसा
अचानक किसी सुबह
अक्सर
कई-कई हफ्ते लग गए इसमेः
यह और खौफनाक था।

और फिर यादें हमारी
लंबी बातचीत की उस दलदल पर, जिसमें
कितने ही अब तक डूब चुके


लाचार मैंने देखा अब उन्हें पड़ा हुआ
खून चूसती जोकों से ढका हुआ
चमकती हुई
आहिस्ता से सरकती कीचड़ में धंसते हुए
चेहरे पर कुत्सित
कामना भरी मुस्कान.

आनेवाली पीढ़ियों से - बर्तोल्त ब्रेष्त

-1-

सचमुच, मैं एक अँधेरे वक़्त में जीता हूँ !

सीधा शब्द निर्बोध हैं। बिना शिकन पडा माथा
लापरवाही का निशान। हँसने वाले को
ख़ौफ़नाक ख़बर
अभी तक बस मिली नहीं है।

कैसा है ये वक़्त, कि
पेड़ों की बातें करना लगभग ज़ुर्म है
क्योंकि उसमें कितनी ही दरिंदगियों पर ख़ामोशी शामिल है !
बेफ़िक्र सड़क के उस पार जानेवाला
अपने दोस्तों की पहुँच से बाहर तो नहीं चला गया
जो मुसीबतज़दा हैं?

यह सच है : कमा लेता हूँ अपनी रोटी अभी तक
पर यकीन मानो : यह सिर्फ़ संयोग है। चाहे
कुछ भी करूँ, मेरा हक़ नहीं बनता कि छक कर पेट भरूँ।
संयोग से बच गया हूँ। (किस्मत बिगड़े,
तो कहीं का न रहूँ)

मुझसे कहा जाता है : तुम खाओ-पीओ ! ख़ुश रहो कि
ये तुम्हें नसीब हैं।
पर मैं कैसे खाऊँ, कैसे पीऊँ, जबकि
अपना हर कौर किसी भूखे से छीनता हूँ, और
मेरे पानी के गिलास के लिए कोई प्यासा तड़प रहा हो ?
फिर भी मैं खाता हूँ और पीता हूँ।

चाव से मैं ज्ञानी बना होता
पुरानी पोथियों में लिखा है, ज्ञानी क्या होता है :
दुनिया के झगड़े से अलग रहना और अपना थोड़ा सा वक़्त
बिना डर के गुजार लेना
हिंसा के बिना भी निभा लेना
बुराई का जवाब भलाई से देना
अपने अरमान पूरा न करना, बल्कि उन्हें भूल जाना
ये समझे जाते ज्ञानी के तौर-तरीके।
यह सब मुझसे नहीं होता :
सचमुच, मैं एक अँधेरे वक़्त में जीता हूँ!


-2-

शहरों में मैं आया अराजकता के दौर में
जब वहाँ भूख का राज था।
इंसानों के बीच मैं आया बगावत के दौर में
और उनके गुस्से में शरीक हुआ।
ऐसे ही बीता मेरा वक़्त
जो मुझे इस धरती पर मिला हुआ था।

जंगों के बीच मुझे रोटी नसीब हुई
क़ातिलों के बीच मुझे डालने पड़े बिस्तर
प्यार के साथ पेश आया मैं लापरवाही से
और क़ुदरत को देखा तो बिना सब्र के।
ऐसे ही बीता मेरा वक़्त
जो मुझे इस धरती पर मिला हुआ था।

मेरे वक़्त में 'सड़कें' दलदल तक जाती थीं
जुबान ने मेरा भेद खोला जल्लादों के सामने
शायद ही कुछ कर पाया मैं। पर हुक्मरानों को
राहत मिलती है मेरे बिना, ये उम्मीद तो थी।
ऐसे ही बीता मेरा वक़्त
जो मुझे इस धरती पर मिला हुआ था।

ताक़त नाकाफ़ी थी। मंज़िल
दूर कहीं दूर थी।
साफ़-साफ़ दिखती थी, हालाँकि शायद ही
मेरी पहुँच के अंदर थी। ऐसे ही बीता मेरा वक़्त
जो मुझे इस धरती पर मिला हुआ था।


-3-

तुम, कभी तुम जब उस ज्वार से उबरोगे
जिसमें हम डूब गए
याद करना
जब तुम हमारी कमज़ोरियों की बात करो
उस अँधेरे वक़्त की भी
जिससे हम बचे रहे।

हमें तो गुज़रना पडा, जूतों की तुलना में कहीं ज़्यादा
मुल्क बदलते हुए
वर्गों के बीच युद्धों से होकर, लाचार
जब वहां सिर्फ़ अन्याय हुआ करता था, पर गुस्सा नहीं।
हालाँकि हमें पता तो है :
कमीनेपन से नफ़रत से भी
चेहरा तन जाता है।
नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ गुस्से से भी
आवाज़ भर्रा सी जाती है। हाय रे हम
हम, जो ज़मीन तैयार करना चाहते थे बंधुत्व के लिए
बंधु तो हम नहीं बन सके।

पर तुम, जब वो वक़्त आए
कि इंसान इंसान का मददगार हो
याद करना हमें
कुछ समझदारी के साथ।

रचनाकाल : 1934-38

मूल जर्मन भाषा से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य

जो वो है - एरिष फ्रीड

यह बेवकूफ़ी है
समझदारी कहती है
यह वो है जो वो है
प्यार कहता है

यह बदक़िस्मती है
हिसाब कहता है
यह दर्द के सिवाय कुछ नहीं है
डर कहता है

यह उम्मीदों से खाली है
बुद्धिमानी कहती है
यह वो है जो वो है
प्यार कहता है

यह बेतुका है
अभिमान कहता है
यह लापरवाही है
सावधानी कहती है

यह नामुमकिन है
तजुर्बा कहता है
यह वो है जो वो है
प्यार कहता है

मूल जर्मन भाषा से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य

700 बुद्धिजीवियों की एक तेल की टंकी से प्रार्थना - बर्तोल्त ब्रेख़्त

1

बिना न्योते के
हम आ पहुँचे हैं
700 (और बहुतेरे अभी राह पर हैं)
हर कहीं से, जहाँ अब हवा नहीं बहती है
चक्कियों से, जो पस्त पीसती जाती हैं, और
अलावों से, जिनके बारे में कहा जाता है
अब वहाँ कुत्ता भी मूतने नहीं जाता।


2

और हमने तुम्हें देखा
अचानक
ओ तेल की टंकी!


3

अभी कल ही तुम नहीं थी
लेकिन आज
बस तुम ही तुम हो।


4

जल्दी करो, लोगो!
उस डाल को काटने वाले, जिस पर तुम बैठे हो
कामगारो!
भगवान फिर से आ चुके हैं
तेल की टंकी के भेस में।


5

ओ बदसूरत!
तुमसे ख़ूबसूरत कोई नहीं।
चोट करो हम पर
ओ समझदार !
ख़त्म कर दो मैं की भावना!
हमें समूह बना डालो!
वैसा कतई नहीं, जैसा हम चाहते हैं :
बल्कि जैसा कि तुम चाहती हो।


6

तुम हाथीदाँत की नहीं बनी हो
आबनूस की भी नहीं, बल्कि
लोहे की!
लाजवाब! लाजवाब! लाजवाब!
तुम निरभिमान!


7

तुम अदृश्य नहीं
तुम अनंत नहीं !
तुम सात मीटर ऊँची हो।
तुम में कोई रहस्य नहीं
बल्कि तेल है।
और हमसे तुम्हारा नाता
भावनात्मक या दुर्बोध नहीं
बल्कि हिसाब के बिल के मुताबिक है।


8

घास क्या है तुम्हारे लिए?
तुम उस पर बैठती हो।
जहाँ कभी घास थी
अब तुम विराजमान हो, ओ तेल की टंकी!
और भावनाएँ तुम्हारे लिए
कुछ भी नहीं हैं!


9

इसलिए हमारी सुनो
और हमें चिंतन के पाप से मुक्ति दिलाओ।
बिजलीकरण के नाम पर
प्रगति और आंकड़ों के नाम पर।

रचनाकाल : 1927


मूल जर्मन भाषा से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य

मिडल क्लास ब्लूज़

रेल के डिब्बे में
ज़िंदगी का अहसास होता है
लोग मिलते हैं बतियाते हैं
कुछ देर की ख़ातिर
कुछ भोले होते हैं कुछ शायद शातिर
मेरा क्या आता-जाता है
उनसे मेरा कौन सा नाता है
आराम से बैठा हूं यहां
डिब्बा चारों ओर से बंद है
बाहर मौसम कैसा भी हो
अंदर एअरकंडीशंड है
सामने बैठे शख़्स की तरह
मैं खा-पीकर पुष्ट हूं
ख़ुश नहीं संतुष्ट हूं
मुझे तंग मत करो
मुझे तंग मत करो

डिब्बे के अंदर
हिलने-डुलने की गुंजाइश कम है
ज़रूरत कतई नहीं
मैं जहां हूं वहीं ठहरा हूं
कुछ घंटों में पहुंच जाउंगा और कहीं
रेल की व्यवस्था में सुरक्षित
मैं आगे बढ़ता जाता हूं
खिड़की के बाहर
पिछड़ती जा रही है सारी दुनिया
सामने कहीं कोई मंज़िल है
जहां पहुंचने की ज़िम्मेदारी
रेलगाड़ी की है
मेरी नहीं
मैं खा-पीकर पुष्ट हूं
ख़ुश नहीं संतुष्ट हूं
मुझे तंग मत करो
मुझे तंग मत करो

तेज़ चलती रेलगाड़ी के लिए
बाकी मुल्क कुछ स्टेशनों के नाम हैं
जहां कुछ मिनटों का रुकना है
बाहर की दुनिया सिर्फ़ एक प्लैटफ़ार्म है
जिससे हमारा नाता
मिनरल वाटर की बोतल खाली होने पर बनता है
या अगर मिल जाए
थोड़ा लेफ़्ट सा कोई रिसाला
- क्या खूब लिखती है
इस लड़की की कलम में तो वाकई जादू है
थोड़ी नादान है
तैंतीस फ़ीसदी से काम बन जाएगा
अगर आठ फ़ीसदी का दस हो जाए
रेलगाड़ी चल पड़ी है
बाहर की दुनिया
फिर से दौड़ने लगी है पीछे की ओर
कितने वाकए पीछे छूट चुके हैं
कितने अभी सामने हैं
रेलगाड़ी दौड़ रही है उनकी ओर
हमेशा की तरह
किसने उसे रोका है
खिड़की के चौखटे की दरमियानी तस्वीर
महात्मा गांधी और राहुल गांधी के बीच
पीएम के चेहरे की तरह
मन मोहने का धोखा है
उनकी फीकी मुस्कान से आश्वस्त हूं
सोचता हूं स्वस्थ हूं
मुझे तंग मत करो
मुझे तंग मत करो

- उज्ज्वल भट्टाचार्य

दस साल पहले

एक तस्वीर की तरह दस साल पहले 11 सितंबर का दिन मेरे सामने उभरता है. मैं जर्मन रेडियो डॉएचे वेले के हिंदी विभाग में पत्रकार था. और साथ ही रेडियो में ट्रेड युनियन का उपाध्यक्ष. दोपहर को युनियन कार्यकारिणी की बैठक के बाद जब विभाग में वापस लौटा, तो हिंदी कार्यक्रम के प्रभारी राम यादव मेरी राह देख रहे थे. पता चला कि अभी-अभी न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के एक टावर से एक जेट विमान टकराया है, मामला आतंकवाद का हो सकता है. कोई डेढ़ घंटे बाद प्रसारण था, हमने तय किया कि समाचारों के अलावा हम पहली रिपोर्ट इसी विषय पर देंगे. फिलहाल बाकी कार्यक्रम योजना के मुताबिक होगा.

हमारी बातचीत चल रही थी, सामने टीवी के पर्दे पर जलते टावर की तस्वीर थी, अचानक और एक हवाई जहाज़ तेज़ी से आते हुए दूसरे टावर से टकराया. यादव जी के गले से आवाज़ निकली, ओह्ह्ह्.....चंद लमहों की खामोशी, उसके बाद मैंने कहा, कार्यक्रम पूरा बदलना है, और प्रसारण के बारे में पहले से कुछ भी तय नहीं किया जा सकता है. हमें लाइव स्टूडियो में सबकुछ तय करना पड़ेगा.

खड़े-खड़े हमने संपादकीय बैठक निपटाया. मुझे कार्यक्रम प्रस्तुत करने की ज़िम्मेदांरी दी गई. आतंकवादी हमलों के बारे में काफ़ी सामग्री हमारे पास थी, लेकिन मेरा कहना था कि इस बार कुछ भी काम नहीं आने वाला है, यह आतंकवादी हिंसा का एक नया स्तर है, मापदंड बिल्कुल बदल चुका है. एक तकनीकी समस्या यह भी थी कि 45 मिनट तक सिर्फ़ मेरी आवाज़ में कार्यक्रम बेहद ऊबाऊ होगा. हमने वाशिंगटन में अपने संवाददाता से फोन मिलाने की कोशिश की. पता चला कि फोन सेवा जैम हो चुकी है. विभाग के सारे साथी अमेरिका में पत्रकारों और परिचितों को फोन करने की कोशिश में जुट गए. हमें घटनास्थल से निजी अनुभव की ज़रूरत थी, लेकिन कहीं कोई मिल नहीं रहा था.

मुझे स्टूडियो के लिए तैयारी करनी थी. समाचार एजेंसियों की ओर से लगातार रिपोर्टें आ रही थीं, उन्हें परखने की शायद ही गुंजाइश थी. मैंने उन्हें इकट्ठा करना शुरू किया. एक साथी समाचार बुलेटिन तैयार कर रहे थे, बाकी सभी फोन करने में व्यस्त थे. मैंने सोचा, फिलहाल शांत रहना है, देखा जाएगा स्टूडियो में क्या किया जा सकता है.

इतने में साथी महेश झा के टेबुल से आवाज़ आई, वॉयस ऑफ़ अमेरिका के साथी सुभाष वोहरा लाईन पर हैं, तुरंत स्टूडियो में पहुंचिए, मैं कनेक्ट करता हूं. दौड़ते हुए तीन कमरे के बाद स्टूडियो में पहुंचा, किसी दूसरे विभाग के साथी काम कर रहे थे, उनको लगभग धकेलकर बाहर किया, महेश ने स्टूडियो में फोन लाईन कनेक्ट किया. सुभाष से बात शुरू हुई. पता चला कि वे रेडियो भवन की सीढ़ी पर हैं, भवन खाली कराया जा रहा है. कोई नई महत्वपूर्ण सूचना वे नहीं दे पाए. लेकिन वहां कैसा माहौल है, इसकी एक जीती-जागती तस्वीर उभरी. लगभग चार मिनट की बातचीत के बाद साथी वोहरा ने क्षमा मांगते हुए कहा कि सुरक्षा कर्मी उन्हें बाहर निकलने के लिए मजबूर कर रहे हैं. हम दोनों की आवाज़ कांप रही थी, जैसे-तैसे बातचीत ख़त्म हुई.

पांच मिनट का समाचार, चार मिनट की बातचीत, 32-33 मिनट का समय मुझे भरना था लगातार आती खबरों से. उनके विश्लेषण की कोशिश करनी थी. दिमाग के अंदर सन्नाटा छाया हुआ था. स्टूडियो के अंदर मैं, बाहर तकनीशियन और विभाग के सारे साथी. क्या मैंने कहा था, बिल्कुल याद नहीं है. बाहर निकला तो विभाग के अध्यक्ष फ्रीडमान्न श्र्लेंडर ने कहा, कार्यक्रम ठीक हो गया. अब अगले दिनों और महीनों में भी यही मेन थीम है. एक फीकी मुस्कान के साथ मैंने कहा – अगले सालों में भी.

- उज्ज्वल भट्टाचार्य

Sonntag, 28. August 2011

ख़त्म हुआ गोदो का इंतज़ार ?

सैमुएल बेकेट के पात्रों की तरह प्रबुद्ध भारत समय समय पर एकजुट होता है, उसे इंतज़ार रहता है बहुप्रतीक्षित गोदो का. गोदो क्या है, कौन है – पता नहीं, लेकिन वह चिरप्रतीक्षित है, उसका जन्म हमारी आकांक्षाओं से हुआ है. यदा यदा धर्मस्य ग्लानि होगी, वह आएगा. कुछ लोग कह रहे हैं कि वह आ चुका है, कुछ लोग इतने आश्वस्त नहीं हैं, लेकिन मान रहे हैं कि अब वह आने ही वाला है.

जी हां, अण्णा के अभियान के प्रसंग में यह बातें कह रहा हूं, और इस अभियान का मज़ाक उड़ाने का कोई मकसद मेरा नहीं है. बेशक इस अभियान का चरित्र जन आंदोलन का चरित्र रहा है – और सबसे बड़ी बात कि इसमें शरीक होने वाले एक बड़े हिस्से की चेतना में अण्णा के सादे निर्मल चरित्र के प्रति भक्ति से कहीं ज़्यादा अपनी और जनता की उठ खड़े होने की ताकत पर अवाक होने, यहां तक कि उल्लसित हो उठने का भाव छिपा है. यह स्थिति नहीं, प्रक्रिया का जयगान है. इसका स्वागत किया जाना चाहिए.

अपनी नई पुस्तक, इन डिफ़ेंस ऑफ़ लॉस्ट कॉज़ेज़ में स्लावोय चिचेक आज के दौर की एक खतरनाक साज़िश की ओर ध्यान दिलाते हैं कि एक व्यापक और विशाल सहमति के ज़रिये सारे मुक्तिकामी विचारों और सामाजिक-राजनैतिक परियोजनाओं को हाशिये पर धकेल दिया जाए. इस साज़िश के तहत कहा जा रहा है कि महान विचारों का युग अब ख़त्म हो चुका है, जोड़-तोड़ और मरम्मत के ज़रिये यथास्थिति को बनाए रखना है.

और इस साज़िश के खिलाफ़ एक छटपटाहट है. समय-समय पर मुद्दों को समझने, उन्हें सार्वजनिक मंच पर प्रतिष्ठित करने, उनके आधार पर सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन का बीज तैयार करने की एक कशिश है. यह आसान नहीं है. पिछली कई सदियों से राजनीतिक दल या सामाजिक आंदोलन इस भूमिका को निभाते रहे हैं. आज वे यथास्थिति की संरचना के अंग बन चुके हैं. विकल्प के रूप में नागरिक समाज सामने आ तो रहा है, लेकिन वह अपने आभिजात्य के दायरे में सिमटा हुआ है, पसीने की बू उसे नहीं भाती.

इसमें कोई अचरज नहीं कि अवतारों की पुण्यभूमि में साकार देवताओं की तड़प रहेगी, वे यदा-कदा दिखते रहेंगे. कभी वे महात्मा के रूप में आते हैं, कभी लोकनायक के रूप में, कभी लगभग निराकार मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रतीक बनकर, तो कभी गांधी नंबर दो की शक्ल में. इनकी नैतिकता के रूप अलग-अलग हो सकते हैं, स्तर भी, लेकिन इनके पीछे जो ललक छिपी रहती है, वह लगभग एक समान है. एक आदर्श भारत, एक आदर्श समाज है – जिसे कुंठाओं और विसंगतियों से मुक्त करना है. एक आदर्श पुरुष आएगा, जो हम सबके अंदर छिपे आदर्श का प्रतीक होगा, प्रतिनिधि होगा.

और इस आंदोलन में एक नारे के रूप में यह ललक सामने आई है – मैं अण्णा हूं. यानी अण्णा को देखकर मुझे पता चला है, मैं कौन हूं.

यक्ष के प्रश्न के उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा था : महाजनो येन गतः स पन्था. महाभारत के बंगला अनुवाद में राजशेखर वसु ने महाजन शब्द की व्याख्या बहुजन या सर्वजन के रूप में की थी. यहां जिन आंदोलनों का उल्लेख किया गया है, उन सभी में मुद्दे को सर्वजन या बहुजन के मुद्दे के रूप में प्रतिष्ठित करने की कोशिश की गई है. सूचना का अधिकार सबके लिए है, संसाधनों का संगत उपयोग सबके लिए है, यहां तक कि सामाजिक कल्याण भी सबके हित में है. और भ्रष्टाचार सबकी समस्या है.

और इन सबके पीछे एक भारत है, जो बहुजनहिताय बहुजनहिताय है, जो स्वर्गादपि गरीयसी है.

क्या ऐसा है ? क्या हमारे भारत में आजका छत्तीसगढ़ या झारखंड, सन 2002 का गुजरात नहीं है ? हमारे घर में रोज़ बर्तन मांजने वाली नहीं है ? क्या हमारे सपने एक जैसे हैं ? क्या हमारे बच्चे साथ-साथ खेलते हैं ? क्या उन्हें बचपन में एक जैसी कहानियां सुनाई जाती हैं ? हमारी परंपरा में सिर्फ मर्यादा पुरुषोत्तम ही नहीं हैं, यह कथन भी है, कोई नृप होई, हमें क्या हानि. क्या यह कथन सर्वजन का है, क्या यह बहुजन का कथन नहीं है ?

क्या भारत सिर्फ एक है, अनेक नहीं ? अण्णा के आंदोलन के बाद इन दोनों के बीच फ़र्क मिट रहा है ? या वे दोनों उभरकर सामने आ रहे हैं ?